Father of Surgery महर्षि सुश्रुत और सुश्रुत संहिता का इतिहास
प्लास्टिक सर्जरी के जनक: महर्षि सुश्रुत और सुश्रुत संहिता का गौरवशाली इतिहास
आज जब हम 'प्लास्टिक सर्जरी' या जटिल सर्जिकल प्रक्रियाओं (Surgical Operations) की बात करते हैं, तो हमारे दिमाग में आधुनिक पश्चिमी चिकित्सा (Modern Western Medicine) और बड़े-बड़े कॉर्पोरेट अस्पतालों की तस्वीर उभरती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिस विज्ञान को आज दुनिया 'आधुनिक' मानती है, उसकी नींव आज से हजारों साल पहले भारत की पवित्र भूमि पर रखी जा चुकी थी?
चिकित्सा विज्ञान और शल्य चिकित्सा (Surgery) के इतिहास में एक ऐसा नाम स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है, जिसके बिना आज का मेडिकल साइंस अधूरा है—वह नाम है महर्षि सुश्रुत (Maharishi Sushruta), जिन्हें पूरी दुनिया आधिकारिक रूप से "Father of Plastic Surgery" (प्लास्टिक सर्जरी के जनक) और "Father of Surgery" के रूप में पूजती है।
क्या आप जानते हैं? ऑस्ट्रेलिया के 'रॉयल ऑस्ट्रेलेशियन कॉलेज ऑफ सर्जन्स' (Royal Australasian College of Surgeons) की लॉबी में महर्षि सुश्रुत की एक भव्य मूर्ति स्थापित है। वहाँ उन्हें दुनिया के सबसे पहले सर्जन के रूप में सम्मानित किया गया है।
महर्षि सुश्रुत कौन थे?
महर्षि सुश्रुत प्राचीन भारत के एक महान चिकित्सक, शिक्षक और शल्यशास्त्री (Surgeon) थे। उनका कालखंड लगभग 600 ईसा पूर्व (approx. 2600-3000 वर्ष पहले) माना जाता है। उन्होंने प्राचीन भारत के प्रसिद्ध शिक्षा केंद्र काशी (आधुनिक वाराणसी) में रहकर अपने शिष्यों को चिकित्सा और चीर-फाड़ (Surgery) का कड़ा अभ्यास कराया।
वे विश्वामित्र के पुत्र माने जाते हैं और उन्होंने दिव्य गुरु धन्वंतरि से चिकित्सा का ज्ञान प्राप्त किया था। सुश्रुत केवल सिद्धांतों पर विश्वास नहीं करते थे; उनका मानना था कि एक बेहतरीन चिकित्सक बनने के लिए किताबी ज्ञान के साथ-साथ व्यावहारिक (Practical) अनुभव होना सबसे अनिवार्य है।
सुश्रुत संहिता: सर्जिकल विज्ञान का पहला महाग्रंथ
महर्षि सुश्रुत द्वारा रचित 'सुश्रुत संहिता' (Sushruta Samhita) आयुर्वेद के तीन सबसे महत्वपूर्ण स्तंभों (वृहत्त्रयी) में से एक है। यह ग्रंथ केवल जड़ी-बूटियों की जानकारी नहीं देता, बल्कि शल्य चिकित्सा (Surgery) का एक संपूर्ण व्यावहारिक गाइडबुक है।
सुश्रुत संहिता की मुख्य बातें:
- अध्याय और श्लोक: इस महान ग्रंथ में 184 अध्याय हैं, जिनमें 1,120 बीमारियों, 700 औषधीय पौधों और विस्तृत सर्जिकल प्रक्रियाओं का वर्णन है।
- सर्जन्स की ट्रेनिंग: सुश्रुत अपने शिष्यों को मृत शरीरों पर चीर-फाड़ सिखाने के साथ-साथ तरबूज, कद्दू, और खीरे जैसे फलों पर कट लगाने (Incission) का अभ्यास कराते थे।
- संक्रमण से बचाव (Antiseptic): उस दौर में भी वे सर्जरी से पहले उपकरणों को गर्म करके और विशेष औषधियों के धुएं से कीटाणुरहित (Sterilize) करते थे, ताकि मरीज को इन्फेक्शन न हो।
प्लास्टिक सर्जरी का आविष्कार कैसे हुआ?
प्राचीन भारत में राजाओं द्वारा अपराध या युद्ध के दंड स्वरूप अपराधियों या युद्धबंदियों के नाक, कान या होंठ काट दिए जाते थे। समाज में ऐसे विकृत चेहरे वाले लोगों को बेहद हीन भावना से देखा जाता था। महर्षि सुश्रुत ने इन लोगों को दोबारा सम्मानजनक जीवन देने के लिए 'प्लास्टिक सर्जरी' का आविष्कार किया।
राइनोप्लास्टी (Rhinoplasty - नाक का पुनर्निर्माण):
सुश्रुत संहिता में वर्णित 'राइनोप्लास्टी' की विधि आज भी आधुनिक सर्जन्स को हैरान करती है। जब किसी की नाक कट जाती थी, तो सुश्रुत निम्नलिखित प्रक्रिया अपनाते थे:
- सबसे पहले वे एक पत्ते से कटी हुई नाक का सटीक नाप लेते थे।
- इसके बाद, मरीज के गाल या माथे (Forehead) से उतनी ही साइज की त्वचा (Skin Flap) को काटते थे, लेकिन उसका एक सिरा मुख्य त्वचा से जुड़ा रहने देते थे ताकि रक्त प्रवाह (Blood Circulation) बना रहे।
- इसके बाद कटी हुई नाक के स्थान पर उस त्वचा को लाकर टांके (Sutures) लगा दिए जाते थे।
- नाक को सही आकार देने और सांस लेने के लिए उसमें अरंडी (Castor) की दो छोटी नलिकाएं (Tubes) डाल दी जाती थीं।
- अंत में, उस पर मुलेठी, सिंदूर और अन्य औषधियों का लेप लगाकर पट्टी बांध दी जाती थी।
हैरानी की बात यह है कि आज की मॉडर्न 'Pedicle Flap Rhinoplasty' ठीक इसी सिद्धांत पर काम करती है।
प्राचीन काल के अद्भुत सर्जिकल उपकरण
महर्षि सुश्रुत ने सुश्रुत संहिता में 120 से अधिक सर्जिकल उपकरणों (Surgical Instruments) का विवरण दिया है। इनमें से कई उपकरण आज के आधुनिक चिमटों (Forceps), स्कैलपेल (Scalpels) और सुइयों (Needles) से काफी मिलते-जुलते हैं।
| उपकरण का प्रकार | विवरण / आधुनिक नाम |
|---|---|
| यंत्र (Yantras) | कुंद उपकरण (Blunt Instruments) जैसे चिमटियाँ, जिनका उपयोग बाहरी चीजों को निकालने में होता था। |
| शस्त्र (Shastras) | धारदार उपकरण (Sharp Instruments) जैसे चाकू और सुइयाँ, जिनका उपयोग चीरा लगाने में होता था। |
| पशु-पक्षी से प्रेरित डिजाइन | इन उपकरणों के मुख सिंह, बाघ, बगुले या कौवे जैसे जानवरों के जबड़ों की तरह होते थे, ताकि पकड़ मजबूत रहे। |
अन्य जटिल सर्जरियों में योगदान
महर्षि सुश्रुत केवल प्लास्टिक सर्जरी तक ही सीमित नहीं थे। उन्होंने मानव शरीर के लगभग हर हिस्से की सर्जरी पर काम किया था:
- मोतियाबिंद की सर्जरी (Cataract Surgery): सुश्रुत को मोतियाबिंद की सर्जरी का भी जनक माना जाता है। वे 'Couching' नामक तकनीक से आंखों के लेंस को साफ करते थे।
- पथरी की सर्जरी (Lithotomy): मूत्राशय की पथरी (Bladder Stones) को सुरक्षित बाहर निकालने की बेहद जटिल विधि का वर्णन उन्होंने किया है।
- हड्डियों का जोड़ना (Fractures): सुश्रुत संहिता में कई प्रकार के फ्रैक्चर और हड्डियों के खिसकने (Dislocations) को ठीक करने के तरीके बताए गए हैं।
निष्कर्ष
महर्षि सुश्रुत का काम इस बात का जीवंत प्रमाण है कि प्राचीन भारत का विज्ञान और तकनीक अपने समय से कोसों आगे थी। जब दुनिया बुनियादी चिकित्सा से अनजान थी, तब भारत में एनेस्थीसिया के रूप में मदिरा का उपयोग कर जटिल से जटिल ऑपरेशन किए जा रहे थे।
आज एक भारतीय होने के नाते हमें अपनी इस समृद्ध और वैज्ञानिक विरासत पर गर्व होना चाहिए। महर्षि सुश्रुत का जीवन और उनकी 'सुश्रुत संहिता' आज भी पूरी मानवता के लिए एक अनमोल उपहार है।

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